Thursday, March 6, 2014






हाँ यूँ ही तो नही माँ मैं बन पाई हूँ

वो जो मेरा दिल है, मेरी जान है
मेरी खुद से शनासाई है
मेरी खुशियों का ज़मान है
मेरी रगों को खींच कर
लहू जिगर का भींच कर
आया था वजूद में
सिमटा हुआ सुजूद में
नर्म गुनगुनी धूप सा
मखमली फुहार सा
बेमक़सद हयात में
मुहमांगा क़रार सा
रूई के नर्म फाहों सा
झिलमिल करती शुआओं सा
फूलों का गुलिस्तान है
जिसके हर फूल में एक जान है
उसकी नन्ही मासूम किल्कारियों ने
रोपी ज़िंदगी ममता की क्यारियों में
उसके रोने में जो सदा लिपटी है
उस आवाज़ पर मर कर भी माँ पलटी है
उसकी हर हर आह को
बोसे से चुना है मैने
नन्ही नाज़ुक पलकों पर
कई ख्वाब बुना है मैने
अपने सीने से लगा कर उसको
हर तक़लीफ़ चुरा लाई हूँ
अपने लाल की ज़िंदगी के हर मौसम में
कभी बादल, कभी साया, कभी परछाई हूँ
हाँ यूँ ही तो नही माँ मैं बन पाई हूँ
हाँ यूँ ही तो नही माँ मैं बन पाई हूँ...

#shaista:

Wednesday, March 5, 2014



Bid Salam! when you cross the cemetery...

Bid Salam!
when you cross the cemetery
Said he, measuring footsteps,
since
souls waited, 
listened , responded
in mum voices
trapped in putrid garb
...
see there slept my mother incessantly, and
my father, adjacent
He pretended,
the tears as complacent
i stippled his pain
with my fingers plain
cajoled his mind not to linger
around graves
that was harbinger...
let his agony rise like plume 
assuaging inwards
my gaping gloom
lulled my withered heart that bled
to love him like his parents meant
adored him like earthly God and,
pampered the child that wept in him
nurtured him in prayers, in rosary beads...
begged for his happiness
and pleaded too
proposed my soul 
immolated myself
to make him love
at least himself
i could never win him
nor my love

.....
at last i stand here near his grave
offering Salam!
near the cemetery
praying the grave to embalm...
to embalm! 

Tuesday, March 4, 2014




तेरे मोमी क़दमो से टपकते हैं फूल खुश्बू की मानिंद
मैं झुक के चुनता जाता हूँ ........सजदे होते जाते हैं


चह्चहा रहें हैं बेकल जज़्बे पलकों की क़तारों पर
आके मिल नींदों के उस पार ख्वाबों के ठिकानों पर


अपने कुशादा सीने की गर्मी में उतार ले मुझको
सर्दियों की बारिश है..........और बेआसरा हूँ मैं

Sunday, March 2, 2014


तमाम रातों की तरह यह रात भी गुज़री है
अपनी जगह उसकी आँखों में रात गुज़री है
धड़क उठता था दिल उसकी हर करवट पर
उसकी तो गुज़र गई, मेरी रात कहाँ गुज़री है

#shaista



~बाँट ले जो तिश्नगि तेरी, वो प्याले बहोत हैं
मुझे जाने तेरे नाम से  ऐसे हवाले बहोत  हैं

मैं हरदम गुम हूँ तेरी   चाहत के छलावो  में
इन छलावो से मेरी रूह   पर छाले बहोत  है...

रफ़्ता रफ़्ता खोखला कर   देते है रिश्तो  को
रिश्तों को घुन की तरह   खाने वाले बहोत हैं

मैं फारमोश कर बैठी हूँ भूक प्यास भी अपनी
सुना है तेरे दस्तरख़्वान पर हमनीवाले बहोत हैं

नंगे पाँव दौड़ जाती हूँ   अब भी तेरी आहट पर
गोया की दिल-ओ-जान पर डाले ताले बहोत हैं ~~

  कोई ख़ला जब माहौल में शोर के बीच बनी दरारों में बैठने लगती है , तो यूं लगता है, बेचैनी को शायद लम्हाती क़रार आने लगा है , शायद होंठ जब चुप...