Thursday, November 23, 2023

 कोई ख़ला जब माहौल में शोर के बीच बनी दरारों में बैठने लगती है , तो यूं लगता है, बेचैनी को शायद लम्हाती क़रार आने लगा है , शायद होंठ जब चुप हो तो ज़हन के पास नमालूम सवाल नहीं होंगे , जवाबों की मशक्कत भी नही होगी , मगर एक कभी ख़त्म ना होने वाला सिलसिला होता है , जो बस सवालों की फेहरिस्त में उलझा अपने होने का मक़सद तलाशता रह जाता है, और ऐसा निगाह ए हद में दूर तक नहीं होता जो जवाब दे सके ।

 जब आपके हाथों से दुनिया की रफ़्तार छूट रही हो, और सफ़र अपने अंदर, अपनी ही जानिब हो, आपका होना आपके कदमों तले जमा होने लगे , होना बेमक़सद हो जाए और जो होना चाहते हैं , वो नामालूम सी कसक सा पहरों पहर चुभता सा हो ,तो कैसी कैफियत होती है?? वैसी ही है !!

जब रोशनी इतनी हो कि अंधेरा भी नज़र ना आए , और अंधेरे भी बेख़बरी के आलम का ही हिस्सा हों , जब किसी के हाल पूछने पे आंसू भी ना आते हों, जब ख़ुदा की दहलीज़ की जानिब सफ़र हो, मगर ख़ुदा रास्ता ना बताता हो, तो कैसी कैफ़ीयत होती है? वैसी ही है !!
जब अपने अंदर सफ़र करते हुए किसी दूसरे सफ़र की उम्मीद में , क़दम तो आगे बढ़ चुके हों , मगर दूजा पांव रास्ता मांगे, और रास्ता अपने पांव खींच ले , और मायूस होके लौटना चाहो , और अपना आप भी ख़ुद को तस्लीम न करे, तो कैसी कैफ़ीयत होती है?? वैसी ही है !!

एक "आम सी ज़िंदगी" 

जब "वो "होती है,

तो महसूस नहीं होती ,

सब पर ध्यान होता है ,
"सिवा उसके!"
मौसम बदलते जाते हैं,
उलझनों में क़ैद
सांसे मद्धम चलती हैं,
फेफड़ों तक पांव पसारने की मशक्कत में,
योग और ध्यान तक आती हुई सांसे,
सब कुछ छू आती हैं,
"सिवा उसके! "
हाथों से हाथ छू जाए उनके
तो सिहरन भी
ना महसूस हो,
एक छुअन भी अनछुई हो जाती हैं,
सब कुछ छू कर भी
"सिवा उसके !"
नन्हें हाथों को बेसाख्ता गालों से लगा लेना
मासूम वजूद को सीने में भींच लेना
ये सब होते हुए भी
नमौजूद सा होता है
"सिवा उसके "!
वो जब नहीं होती, छुअन को तड़पता वजूद
मासूम की नन्ही बाहें को पुकारता
कितना याद करता है "उसको ",
एक "आम सी ज़िंदगी को" !
एक "आम सी ज़िंदगी"
कितनी कीमती होती है
मुझ से पूछो!

Saturday, May 30, 2020

अगर वो देख लेता ...

~~अगर वो देख लेता ...~~


वो दम बखुद मोबाइल और  वाइ फ़ाई के सिग्नल्स जिस शिद्दत से देखता है,
काश उसने यूँ ठहर कर मेरे खामोश लबों की जानिब देखा होता ...
तो पत्थर का बुत भी खुदा से ज़बान माँग बैठता की उसकी नज़र मायूस ना लौटे...
उसकी बेताब नज़र क्या कर सकती थी उसको अंदाज़ा ना था....
अगर वो ठहर के देख लेता तो ...
पोर पोर से शर्म ओ हया के उन्स मे लिपटा पसीना यूँ छलक पड़ता मानो उसने पलकों से भंवर उकेर दिए हो बदन की जिल्द पर....
उसकी नज़रो के लम्स के मुंतज़ीर के मारे लब मेरे ..थरथरा उठते ,गदरा जाते ...इक़रार ए उल्फ़त के शौक़ मे....
बाज़ू नदी हो जाते , जिस्म को छुपा लेते ...

अगर वो देख लेता ...

सिर सजदा मे होता,
आह दुआ बन सांसो से रिहा हो जाती....
और  घुरूर आँसुओं सा तुम्हारे क़दमो तले यूँ जमा होता जैसे आँखे बरस के पानी हो चुकी हो और  सींच रही हो तुम्हारी तवील उम्र की ख्वाइश को  ....

काश तुमने यूँ ही ठहर के देखा होता ....
तुम्हारी इन ठहरी हुई पलकों पे मेरी दुआओं के बोसे होते ,
पलकों के भारीपन को बेशुमार चूम लेते , आगोश ए ज़ुल्फ में सुकून से समेट लेते ..
यूँ भुला देते हर रंज ओ आह को  जैसे दुखो के मरासिम पे रजनीगंधा गूँथ देते... की हर साँस तेरे शाने पे तहरीर कहती ...रुबाई लिखती ...अपनी बेचैन तमन्नाओ की....
काश तुम ठहर के देख लेते कभी यूँ ही जैसे मैने चाहा था...
मैं उन नज़रो मे प्यास तलाश लेती...अपने बेताब दीदार की प्यास...
उन नज़रो मे दो होंठ उगा लेती ... लफ्ज़ नक्श कर लेती..खुद को मुखातिब करते लफ्ज़...
मगर काश ..काश ही रहा ....
तुमने देखा नही ...ओर मैं तरसती ही रही...
तड़पती ही रही....!!

Dr Shaista Irshad







Tuesday, May 26, 2020

four liners

ख़ारिज ए दर्द ये उल्फ़त अगर हो जाए तो
दर्द में फिर दर्द की शिद्दत है क्या ये पूछिये!
ये पूछिये, हम तुममें खास क्या और आम क्या?
एक दूसरे में कौन कितना बाक़ी है ये पूछिये!!

उसके सांस लेते पाँव


~~ उसके सांस लेते पाँव

एक लड़ी की घुंघरू की  पायल उसके गन्दुमि(गेहूँ रंग की ) पाँव से यूँ झूल रही थी जैसे
गेहूँ की बाली के पोरों से सिहर के टूटते बारिश के मोती...
उसका एक पैर कासनी रंग की साड़ी से मनमानी कर बाहर निकल आया था,
जैसे पाँव की उंगलियों साँस लेना चाहती हों
जैसे मकई  की बाली के दाने कमसिनी के ज़ोर से फूट पड़े,
जैसे रोशनी चराग़ की लौ से एक घुँगराली सी  चिंगारी चुरा कर दूर छिटक जाए!

वोह क़द्र ए हसरत से पाँव देखता रहा, फिर पायल और फिर उसकी उंगलियों मे ही कहीं खो गया!
शायद वो गहरी गुलाबी नैल्पोलिश जो मध्धम होने पर भी उंगलियों पर दहक रही थी , निगाहों से चखता गया,

मासूमियत का ज़ायका, कमसिनी के किवाम में,
वो गहरी साँस भर के सिर झुका गया, आँखो मे सजदे थे, दुआ थी,
और हसरतों का तवाफ़ था,

अनमनी सी ख्वाइश हुई मेहन्दी लगे सुर्ख पाँव का ज़ायका क्या होगा ?
उतने ही सजदे होंगे या नियत टूट जाएगी,??
मुहब्बत मे पाकीज़गी का क़ायल वो,
अपने सिर पे तलवार और आँखो मे क़यामत लिए ,
नज़र से सींच रहा था अपनी एक तरफ़ा मुहब्बत को!

उसने नींद मे ही पहलू बदला था शायद , और बिजली सी क़ौन्द गई थी,
नज़र हिचकिचा के बेसाखता पिन्ड्लियो पर पहुँची ... ठहर गई
जैसे गर्दिश ए लम्हत, माह ओ साल रुक जाए, क़यामत चौखट पे खड़ी हो और आगे बढ़ने को इजाज़त माँगे...

साफ शफ्फाफ पिन्ड्लिया, जैसे चाँद तराश रहा हो कोई संगतराश ,
और चाँदनी उसके लबों पे थी..
हर घूँट आब ए हयात थी...
तसव्वुर ए इश्क़ मे आब ए हयात...

अचानक जैसे किसी ने उसे पुकार लिया और पाँव के घुंघरू बज उठे ...

और यूँ लगा उसने दिल पे पाँव रखा हो...
उस गायबाना लम्स को पी गया वो अपने जिल्द के पोरो से ...
जैसे बरसो से खामोश खंडहर मे कोई शोर पी जाए

शोर पी के कोई सन्नाटा कब सैराब हुआ है?
 मुस्कुराहट के कुम्कुमे, ओर महबूब की सरगोशियों मे साँस लेने की आरज़ू ..
ये ही चन्द ख्वाइशें जिसे वो जमा करता तो "घर" बना लेता!
कोई ऐसा भी होता है क्या ?
जो किसी अनदेखे के पाँव मे सिर झुक लेता है?
उसके अपने घर की एक दीवार की झीरी  से बस यही जन्नत देखी थी .....
ओर उसी झीरी के नाफ़ ए प्याले से उसके पाँव की लज़्ज़त लेता रहा....आब ए हयात पीता रहा...
पैत्याने  मे सिरहाने सा सुकून उसने ही तलाशा था... ..!

डॉ शाइस्ता इरशाद





Sunday, May 24, 2020

~~ दो कान ~~Two ears ~~


                                                                         ~~ दो कान ~~

इस पूरी  क़ायनात  में है बस मुँह ही मुँह नज़र आते है , बोलते मुँह, चीखते मुँह, इलज़ाम देते, शिकायत करते, ज़िम्मेदार ठहराते , ज़ख्म लगाते, ..बस मुँह ! मुँह से मेरा मतलब ज़बान से है क्योंकि मैं  कान के बारे में कहने जा रही हूँ! हर कोई यूँ मुँह तक भरा  हुआ है की छलक जाना चाहता है , समझ में आना चाहता है, खुद "बिना सुने "! "काश  तुम सुन लेते", "काश तुमने सुना होता", "सुनो ज़रा सुनो तो ! "

मगर यहाँ तो हर कोई अपनी बारी के इंतज़ार में मिला , कहने के इतंज़ार में, जवाब देने के इंतज़ार में , लफ्ज़ो से कूट कूट के भरा हुआ , जैसे चराग जल उठता है तो सोचता  है  अब अँधेरा कहीं नहीं , मगर हाय  रे नादानी , अपने की क़दमों पर  नज़र नहीं जाती, अगर चली जाती  तो यूँ ही ठहर जाता जैसे मोर थिरकते हुए थम जाता है अपने पैरो की जानिब देख कर ! हाँ तो मुँह...  की बात थी... लोग क्यों इस क़दर भरे हुए हैं? और भरे हुए हैं तो किस्से ? क्या है जो सारी  उम्र कह कर भी निकल नहीं पाता ? क्यों बेचैनी दिखती है तमाम सिम्त ? ये सब तरफ तरफ घिरा हुआ तन्हा  इंसान , मुहब्बतों को, तवज्जोह और दो कान को तरसा हुआ ? इस क़दर तनहा की कभी मुर्दे के पास बैठ कर भी चुप नहीं रह पाता , बोलता जाता है, ज़िन्दगी की बातें, रोज़मर्राह की बातें,  कपडे , खाने ज़ेवर की बातें..! ये जज़्बातों के नक़ाब में बेहिस इंसान "मुँह ही मुँह" है " कान "नहीं !
ऐसे में कान की बातें करने वाला बेवक़ूफ़ कहलाएगा शायदद... !

ज़िन्दगी के वह दिन कमसिन तो न थे मगर ये ज़रूर थे की मुहब्बत चखने के मुन्तज़िर थे , किसी के ख्याल पे खिल उठना , तारीफ पर सिमट जाना .. क्या किसी को सिखाना पड़ता है? और वह आवाज़ की तरह उतरा था दिल ओ  ज़हन पर, जी मैं  मुँह की ही बात कर रही हूँ ! तो आवाज़ बन के पहले कान में शामिल , फिर ज़हन ओ जज़्बात में  शामिल और फिर मुहब्बत बन गया , और मैं , मैं बन गई "दो कान ".. मुहब्बत के, ख्वाबों के , ख्वाइशों के, मीठी सी कसक और जुस्तजू के ," सरापा कान" ! क्यों ? क्योंकि वही शरीक़  ए  सफर होने वाला था , मंगनी से शादी तक का सफर मैंने कान बन के अदा किया ! ऐसा नहीं था की उसकी सूरत से वाक़िफ़ न थी , एक दो बार देखा भी था , मगर  शनासाई और शनाख्त तो आवाज़ से हुई थी न !  सारे ख्वाब आवाज़ ने दिखाए, शिकवे भी आवाज़ से, मनाया भी आवाज़ ने, और शर्म , और वह पहली सी धनक और शर्म ओ  हया भी आवाज़ ने खिलाई गालों पर ! और भी बहोत सी चीज़ो के लिए कान  बनी मैं उन दिनों; क्या कहूं की उन दिनों हर किसी को मुँह और ज़बान मिल गई थी ; जैसे चाँद , जैसे रजनीगंधा और आर्किड के फूल, जैसे रंग बोल पड़ते थे, और तो और लफ्ज़ भी बोल पड़ते थे ! हवा की ज़बान दूसरी  थी, बारिश और फुहार की पुकार दूसरी , सर्दियों की चुभन और कोहरे की खुशबु की ज़बान दूसरी !

और जब एक दिन तमाम रस्म ओ रिवाज़ो में बंध  कर वह शरीक़  ए  सफर हुआ तो लगा वह आवाज़ इस चेहरे से तो मेल ही नहीं खाती , वह आवाज़ अलग है और यह चेहरा अलग , बस उन्ही दोनों को मिलाने में उम्र गुज़रती गई , मिले नहीं दोनों कभी भी , जो उल्फत आवाज़ से हुई उनसे न हो पाई , और फिर धीरे धीरे आवाज़ खो गई और वह पहली सी उल्फत भी.... दोनों खो गए ,  ! अपनी इस कैफियत से जब तक  दो चार रही तो लगा किसी से तो कहूं की यूँ भी होता  है कही? मगर जब सर उठाया तो लगा सब तरफ सिर्फ मुँह ही मुँह थे , कान एक भी नहीं , कोई   दुनियादारी बताता,   गृहस्थी की ज़िम्मेदारी , कोई कहता हकीकत को तस्लीम करो,  ज़िन्दगी ख्वाब नहीं। .. हत्ता  की यहाँ तक हुआ की जिसक लिए मैं कान बन गई थी वह भी मेरे लिए "दो कान "न बन पाया ! और फिर हुआ यूँ की मैं मुँह  बन गई , यूँ जैसे हर वक़्त अपनी तकलीफ को कहने की कश्मकश  से दो चार हूँ ,  छिछली हो गई, उथली हो गई, छलकने लगी... हर वक़्त लगता जैसे लफ्ज़ो से ज़बान उबल जाएगी , मगर यहाँ तो लफ्ज़ो का तबादला नहीं दो ज़हनो का ठहराव दरकार था , मगर ज़िंदगी थी की भागी चली जाती थी...! मुझे बेहद शिद्दत से मुँह से वापिस कान होने की तरफ लौटना था , मगर लौटने का कोई रास्ता नहीं मिलता था ; पहले मुँह और फिर चीख चिल्लाहट में तब्दील हुई ! तभी कुछ हुआ , दो मूवीज देखने का मौक़ा लगा , Her और Lunchbox . ज़िन्दगी को किसी और नज़रिये से देखने का मौक़ा मिला।  Her मुझे यह समझा गई की मुहब्बत आवाज़ से ,  मुमकिन है, चेहरा तो हम खुद गढ़ लेते है, दो आँखों दो कान वाला ! फिर उस आवाज़ को इंसानी शनाख्त की भी ज़रूरत नहीं थी , वह AI होने क बाद भी मुहब्बत हो जाती है, मुहब्बत सिखा जाती है !
प्रोटागोनिस्ट की लाइफ में जब वह operating system  समान्था आई तो उसकी  ज़िन्दगी के मायने बदल गए और फिर जिस्मानी तस्कीन के लिए भी उसे किसी जिस्म की ज़रूरत नहीं थी , यूँ ही होता है जब कोई रूह की खुराक बन जाता है, चिराग से मुहब्बत उसके अँधेरे तले में बैठ कर करता है , शायद ये मुकम्मल प्लेटोनिक लव होता है! शायद दो कान ही  होते हैं जो किसी को उसकी असल शख्सियत और शनाख्त से वाबस्ता करते है, जैसे की कोई ये कहे " मुझे खुद को समझने के लिए तुम्हारे कान की शिद्दत से ज़रूरत थी, की इंसान लफ्ज़ो में  ढलने के  बाद खुद को तीसरी जगह से देख पाता है "! ऐसी ही Lunchbox ये सुकून दे जाती है की कैसे उम्र की सरहद से परे कोई किसी के कानो के सहारे खुद में नई ताक़त , नए ख्वाबो को जगह देता है!  उन खतों के ज़रिये दोनों पहले खुद को फिर एक दुसरे को तलाश लेते हैं !
बस यूँ ही से दो  कान की तवक़्क़ो और उम्मीद रही सदा से जो बस आवाज़ के  सहारे मरासिम बना ले, , जो सुने -  जो कहा वह भी , जो नहीं कहा वह भी , जो कहना चाहा वह भी,  जो कहते हुए रुक गए वह भी ! जो समझ ले मेरी घुटी चीखो को, और खोखले लफ्ज़ो को , जो जज न करे , जो अपनी लम्बी गुफ्तगू के आखिर में  मेरे दिए जवाब में एक  "जी "को भी उतना ही समझे जितना मेरी तवील बहस को भी !  जो यह समझ ले की कब मैंने तकलीफ नहीं कही, कब चुपके से रो ली,  कब दुआ दे दी , कब खी खामोशी  दे दी , सब अनकहे मरासिम में आवाज़ के सहारे....
जाने क्यों अब लगता है ऐसे भी लोग होते हैं.... जो आपको समझने के लिए खुद आपसे रूह ओ इश्क़ में बंधे हो ज़रूरी नहीं , वह बस एक दुआ से होते हैं, पाक़  और बेगराज , बिना शिकायत,  बिना इलज़ाम, बिन उम्मीद बिन जजमेंट बस संवार देते हैं ! दो कान हो जाते हैं , दो कान बना देते हैं !














Monday, May 18, 2020

~~अम्मा अब चल ना पाऊँगा ~~

                       


  ~~अम्मा अब चल ना   पाऊँगा ~~

यहाँ हद नही है रास्तों की,है बिना उफक़ के आसमान
बेहद है सब कुछ यहाँ , फिर भी क़फस मे सारा जहाँ

दहलीज़ है क़फस कहीं तो, कही क़फस है रास्ता
कोई रिहाई माँगे सफ़र से, कोई भूख से है माँगता

पहले पाँव, फिर थे छाले, फिर घुटनो की बारी आई
जब घुटने भी फूट गाए  ,कोहनी ने तब पुकार लगाई

पी कर सारा लहू जिस्म का सड़क फिर भी ना सैराब हुई
रोटी की परछाई दिखाई और  सहरा से सराब हुई

कहीं उखड़ गई साँस सीने मे, जब  धड़कन से निकली जान
अम्मा अब ना चल पाऊँगा, कह का मासूम हुआ बेजान

गोदी मे ढुलकी गर्दन पे अम्मा चीख के रोती है
कही दूर एक नर्म बिस्तर पे मम्मा लोरी पिरोती है

कही सब्ज़ी लगे हाथ चाट्ती सड़क की भूक ना  मिटती है
कही रोटी पकड़े हाथो की लकीर ट्रेन से कटती है

शहर की सरहद पे एक बेवा, और घर पे बेदम शौहर है
घर पे रोते चीखते बच्चे, और क़िस्मत मांगती जौहर है

बाप के कांधे पे देखो बेजान हो गया एक मासूम
बेबस क़दम, लाचार सफ़र मे, दम निकला जाने किस जून

पथराए हवासों को जब साथी मुसाफिर होश मे लाए
तड़प तड़प के बाप पुकारे, बच्चा कैसे होश मे आए

बेदम तो सारी क़ैयनत है, होश मे कौन सा राही है
पिघला सीसा रवाँ रगों मे, मुँह पे ग़ुरबत की स्याही है

ट्रक के शिकम मे ग़ुरबत थी बैठी, जैसे आँतो मे भूक हो चिपकी
एक कराहे दूजा रोए, रब जाने कब मौत हो किसकी

अधमरे जिस्म को मरा मान के गाड़ी से सड़क पर दिया उतार
ज़िंदा बच्चे, साथ चल पड़े  हर जानिब थी मौत क़ी कगार


प्यासे होंठ, सूखा जिस्म, हड्डी चमड़े मे लिपटा इंसान
कहे है हमसे  ज़मीर मे झाँको, क्या मर गया सब का ईमान!

Dr Shaista Irshad




NEW NORMAL- ~~ नया नार्मल~~

                                                                     ~~ नया नार्मल~~ 


शाम मध्धम रंगो की ज़रख़ेज़ी लिए हमेशा की तरह  नार्मल लग रही थी  मगर उसकी रेशमियां अपने लम्स की दस्तरस में मौजूद सभी चीज़ो को नार्मल होने और नार्मल नज़र के दरमियान का फ़र्क़ मानो समझा रही हो! "नार्मल नज़र आना" या यूँ कहिये "नज़र आना ", शायद यही एक चीज़ हमें दुनिया की तमाम मखलूक से मुख्तलिफ बनाती है,  ! "होने" और  "नज़र आने " के दरमियान  जद्दोजहद, ईमानदारी या झूट को ही ज़िन्दगी कहते है शायद!
ज़िन्दगी यूँ महसूस होती है जैसे। जैसे सफर के आगे का सफर हो , यूँ जैसे  रेस में भागते हुए जब लाल रिबन पार करने के  बाद जो मोमेन्टम बरक़रार रहता है, की क़दम ठहरने में वक़्त लगता है, इनर्शिया  हासिल होते होते मंज़िल दूर छूट चुकी होती है... बस ज़िन्दगी उन्ही न ठहरते  क़दमों के दरमियानी मायनी में उलझ सी गई हो, या फिर जब मुलायम बिस्तर पर नन्हे बच्चे को कहानी सुनाते  हुए जब कहानी भूल जाए और सुनाने  वाला बस लफ्ज़ो में सांस  भरता रहे.... ज़िन्दगी उन्ही कहानियों सी हो गई...बस पूरा होने की ज़रूरत सी, ... या फिर कहानी सुनने वाला जब सुनते हुए बीच में ही सो  जाए.... तो जो  लफ्ज़ ओ  ख़याल  भटक जाते है..उन्ही  भटके हुए लफ्ज़ो सी...! ये जो नज़र आने की उम्मीद होती है ना , सामने वाली की बीनाई  पे कुढ़ा करती है, यहाँ तक की दो आँखे भी दे बैठती है नादानी में, लफ्ज़ो की आँखे, अहसास ओ मुहब्बत की  आँखे , मगर लफ्ज़ो से, बंजर ज़मीन तब तक ज़रखेज़ नहीं हो सकती जब तक  ज़मीन क़ुबूल न करे ! और इस बात को क़ुबूल करने में कभी कभी तमाम उम्र खर्चनी पड़  जाती है की कोई शामिल ए हयात रहा, क़ुबूल न किया जा सका ! 

ज़िन्दगी पर बात तो तमाम  ज़िंदग हो सकती है और  फिर भी कोई नतीजा हासिल हो ये ज़रूरी नहीं ! ये कुछ दिनों का लॉकडाउन , और यूँ लगता है ज़िन्दगी की गिरह खुल गई हो,  जैसे "होने और नज़र आने" का फ़र्क़  बेहतर समझ आया हो, ये तस्लीम हुआ हो की अपने अंदर को अपने बाहर से मिला लेने का वक़्त है, ये मान लेने का वक़्त है की खुद में क्या गलत रहा , क्या सही रहा! क्या ज़रूरत रही और  क्या मुहब्बत रही! कहाँ  दायरा खींचना है और कहाँ  तहलील होकर जज़्ब हो जाना है! अपनेआपसे भागने का वक़्त ,ख़त्म हुआ, और अपनी ही नज़र में पशेमानी  का वक़्त शुरू हुआ ! नफा- नुक्सान  अयाँ हुआ , कहाँ  इस्तेमाल हुए, कहा मर्ज़ी से मिट गए !
जिस्म की खुराक से ऊपर उठ कर रूह को मोअतबर करने का  सिलसिला  रहा ये लॉकडाउन ! वह आँखे  जो ये बता सके अपनी आँखों से देखना क्या होता है? अपनी मर्ज़ी से जीना क्या होता है, दुनिया की ख्वाइश की पीठ से उतर के अपनी रफ़्तार से चलना क्या होता है, "ना "कहना  क्या  है और  ,हाँ के क्या मायने हैं? आँखे बंद करके अपने अंदर देखने का सुकून क्या है, वह देखना जो खुदा है और खुद में है! 

चिराग के धुंए में था तलाश रहा  मक़सद ए हयात 
आँख को नज़रिया  मिला , मिला हाथ को अपना हाथ !










Thursday, May 14, 2020

बेनाम मरासिम

बेनाम मरासिम

वो मसनूई एक आवाज़ है
जो तमाम तहों में सिमट के भी
करे है मदावा मेरे हाल का
जैसे छुपा हुआ कोई चIरागर

मैं आँसुओं में अदा हुई 
कभी टीस बन कभी आह बन
कभी साँस थी कभी शोर था
नहीं खुद पर कोई ज़ोर था

काँपते लबों में जब
सिलवटों का क़याम था
मैं चुप रहूं या कुछ कहूँ
लहजा मेरा आम था
वो सिलवटों पे रख के लफ्ज़
उंगलियों मे पिरो के यूँ
मुझे हर्फ ब हर्फ और लफ्ज़ ब लफ्ज़ 
लिखा करे है ठहर के यूँ
जैसे उम्मीद जबीन ए चाँद पर

दरीचा है, दरवाज़ा भी, 
आह भी और गवाह भी
कभी सरIपा दर्द ए क़याम है
जो ठहर के भी है रवाँ रवाँ 
जैसे मसीहाई का पयाम है
ये कौन सा मक़ाम है
जब बिना उम्मीद ओ मरासिम के भी
तकिये पे फूल रख जाए है
दर्द में यूँ आए है ...

मुझे वाक़िफ़ करे है मुझसे यूँ
जैसे शनासाई एक उम्र की
मुझे मिला के मेरी शिनाख्त से 
मुझे मेरे पास सहेज कर
लौटा रहा है मुझको वो 
मेरे लफ्ज़ मुझको भेज कर
मैं कागज़ी मैं आरज़ी
 रिहा करके क़लम की नोक से
मैं हो गई हूँ मुस्तकिल..
हाँ तभी से हूँ मैं मुस्तकिल...

Masnooi: jani pahchani
marasim: rishta
jabeen :matha
madaava: ilaaj
Dr Shaista Irshad
shanasai: pahchan
aarzi: temporary
mustakil: permanent 

Sunday, May 10, 2020

~~मैं खुश्बू का क़ाफ़िला हूँ~~

~~मैं खुश्बू का क़ाफ़िला हूँ~~

मैं खुश्बू का क़ाफ़िला हूँ
जो सरापा फूल बन जाते 
तुम्हारी ज़ूलफें अगर छूते 
कानों के ज़रा ऊपर 
गुलाबी जिल्द पर उभरी 
हरी उस नस की धड़कन को
अपनी रग मे धड़कIते !


मैं खुश्बू का क़ाफ़िला हूँ
जो सरापा फूल बन जाते 
तेरी मासूम लट थामे
गरदन तक उतर आते 
उलझे ख़म को सुलझाते 
सुलह आपस मे करवाते 
और हर एक बोसे मे
बहार ओ गुल खिला जाते!


मैं खुहबु का क़ाफ़िला हूँ
जो सरापा फूल बन जाते 
तुम्हारी उंगलियों में 
जो शर्मगी लम्स ठहरा है 
उस लम्स की सांसो मे 
अपनी साँसे पिरो जाते 
वो साँसे फिर खनक उठती 
सिहरती सुर्ख़ चूड़ियों मे 
उंगली दाँत की हमराह 
फिर शर्मा का बिछ जाती 
उनसे उभरी शोखी में 
हम ही हम नज़र आते !


मैं खुश्बू का काफिला हूँ
जो सरापा फूल बन जाते 
तेरे पाँव की एड़ी से 
लम्स बन कर, सदा बन कर
दुआओं सा बिखर जाते 
नक्श-ए- पा पर फिर तेरे 
सदजो की तरह बिछ कर
आरज़ुओं को मनवाते 
मैं खुश्बू का काफिला हूँ
जो सरIपा फूल बन जाते!!

Dr Shaista Irshad 
नक्श-ए- पा: footprints
शर्मगी: shy 
सिहरती: shivering


Friday, May 8, 2020

A mother in quarantine

~~क्वारन्टाइन में एक माँ~~

कौन सी नज़र, नज़र ए आख़िर थी

ये उस चौखट के सीने मे धसी 

आखरी ख्वाइश सी बेताब नज़र 

की गवाही मे पिन्हां  है ,

वो नज़र जो लख़्त ए जिगर को

फक़त एक बार कलेजे से लगाने की 

बेताबी में अपने होठ 

काट बैठी थी 

लहू फूट पड़ा था सिसकियों से 

उस 2 साला नन्हीं जान की 

पुकार मे मुन्तक़िल  आँखो की उम्मीद पर ,

धड़कनो के बीच महज़ एक पारदर्शी चौखट 

और एक दस्तक का फासला अज़ल तक फैला हुआ ,

करोना मे क्वारन्टाइन एक माँ

जिस के बोसे दरवाज़े की झीरी में दर्ज है 

ममता के बोसे होंठो के निशानात मे साँस लेते है 

काँच की चौखट से अपना धड़कता दिल मंसूब कर

वो सरापा दहलीज़ में तब्दील हो जाना चाहती थी 

हवा बन जाना चाहती थी 

जिस्म उतार देना चाहती थी 

काँच की जिल्द पर दम तोड़ती दस्तक 

को रग़ ए जान मे उतार लेना चाहती थी 

वो चाहती थी उन फूल से गालो और आँसुओं क दरमियाँ 

सुर्खी से भीगे होंठो से तमाम याद चुन ले 

याद अपने माँ होने की, और भुला दे 

उस मासूम के ज़हन से ममता का लम्स 

मगर कुछ भी ना हुआ सिवा इसके 

की वो माँ जिस्म उतार बैठी 

और दरवाज़े से रिस गई...

मगर अब इस पर चीखें दर्ज हैं 

किसी मासूम के नन्हे जिगर को चाक करती 

दरवाज़े पर पुकार की तरह दम तोड़ती हुई 

मगर चीखे दर्ज है,!

Dr Shaista Irshad


अज़ल: eternity
मुन्तक़िल: tranferred
पिन्हां: embedded



Wednesday, May 6, 2020

~~गुफ्तगू~~

~~गुफ्तगू~~

कान को उसके सीने पर रख कर पहली बार मैने उसकी धड़कन नहीं सुननी चाही थी, बस कान टीका दिए, यूँ जैसे कोई लंबे सफ़र के बाद बादलो की जानिब देख कर बारिश की तमन्ना कर बैठे, या फूल हाथ मे लेके ये सोचे की कब तक इसमे लम्स ओ साँस बाक़ी रहेगी, या फिर किसी दरख़्त की छाँव में उसके हरेपन को खुद की साँस में यूँ उतरता महसूस करे जैसे जड़ें ज़मीन की आगोश को भेदती चली जाती हैं! मैने  उसकी धड़कन को खुद मे सोखने के बजाए चाहा था की उसकी ख्वाहिशें , और उसके वो लफ्ज़ जो मेरे अपने दिल को बदस्तूर अंदर से लहू लहू कर रहे थे , वो कानों के ज़रिए वापिस उसके अंदर उतर जाए, जैसे कोई दरिया के सफ़र का रुख़ समंदर से परे मोड़ दे, या सांसो से गुलों की खुश्बू सारी की सारी पी जाए... इस क़दर लफ्ज़ थे, इस क़दर प्यास थी, इस क़दर शोर था , इस क़दर वीरानी थी, बस सब कुछ बेइन्तेहा था, फिर भी मैं खाली खाली थी!
मैं खूब बोलती थी, फिर भी बातों को तरसती ... कोई देखता तो पूछता भला दरिया में रहकर ये तिशनगी  कैसी , और मैं बेलफ्ज़ ही बोलती, मुझे उसकी धड़कनो को सुनते हुए बोलना है, तब बोलना है जब वो सिर्फ़ मुझसे मुखातिब हो, जब उसकी खामोशी में भी मेरी मुहब्बत की लरज़िश हो,  उसकी आवाज़ सिर्फ़ मुझ तक पहुँचे, वहाँ पहुँचे जहा किसी की पुकार की रसाई ना हो...
बातें तो दो रूहों के दरमियाँ की गुफ्तगू है, वो दो दिलों को यूँ जोड़ती है जैसे मुस्कान को होंठो में पिरो कर आँखो में सजाया जाए! मैं चाहती थी मेरे लफ्ज़ जब उसके होंठो को छुएँ तो उसके ज़हन ओ दिल में बो जाएँ , और जुगनू की फसल मेरे शाने पे बिखरे, मेरा चेहरा रोशनी के हाले में हो, उसकी तवज्जो और उलफत का हाला!
मैने सिर्फ़ मुहब्बत पर बहस या गुफ्तगू की सवाली नही थी...मुझे लफ़्ज़ों से हामिला मायनेखेज़ तवज्जो की जूस्तजू थी, और वो दुनिया भर की बात करता मगर मुझसे बेज़ार रहकर, सारी बातें ज़हन का मरकज़ होती मगर वो ना होता जिसकी ख्वाहिश मे कानो की जूस्तजू में तर-बतर फसल बंजर हो चुकी थी...

लफ्ज़ , जब उम्मीद से खारिज हो तो कितना मायूस करते है, ये कोई मुझसे पूछे, ये एकतरफ़ा मुतालबा अपनी रूह ओ ज़हन से करते करते एक मुकम्मल गुफ्तगू का ख्वाब कितना थका देता है कोई मुझसे पूछे...!!



Monday, May 4, 2020

दुल्हन

दुल्हन

एक वक़्त ऐसा था लड़कियों को आईना देखने की इजाज़त नही थी .. लेकिन लड़कियाँ खुद को ना निहारे
तो अल्हड़पन को कैसे पार करती... १ पैसे की सुर्खी खरीद लाती ओर चुपके से होंठों पर रगड़ के 
मटके मे मुँह डाल देती... अंधेरे मटके के पानी में ढुंधलया सा अक्स जाने कैसी खुशी देता था...अपने कामिनी कमसिन से रंग में लबरेज़ खुद को हसीन मान के बेपनाह ख्वाब सजा लेती... खूबसूरत लगने का शौक़... सराहे जाने की आरज़ू जाने कितने सदियों से चली आ रही है...

ये अच्छा लगना क्या होता है ..."वो" नही जानती थी , बस एक अफ़सुरदगी उसकी ज़ात का हिस्सा थी - गहरा साँवलापन जैसे उसके घर वालो ने उसके तन बदन पर खींच दिया था, उसकी शनाख्त बना कर उसका आसमान, उसका उफक़ बना दिया था, और रह गई थी उसके पास कलम और स्याही , अपने रंग के ज़ेर ए नज़र सारी स्याह चीज़े दिल के क़रीब होती गई... स्याही,  रात, आँखे,  और ग्रॅफाइट !

उस दौर के खिलते फूल ओर ज़र्द पड़ते पत्तों ने उसकी खामोशी की गुफ्तगू को बारहा सुना होगा ,  उसके पास और कोई नही था जो उसको खूबसूरती का मतलब समझा सके.... आईने से भी कोई दोस्ती नही रही थी! कभी बहोत तजस्सुस होता तो माँ के घुटनो मे मुँह दे लेती और पूछ लेती ..अम्मा आप के वक़्त मे खूबसूरत लगना क्या होता था?? 
तभी उन्होने ये क़िस्सा सुनाया था...
"पहले के लोग ऐसा मानते थे की अगर लड़कियाँ खुद की खूबसूरती से वाक़िफ़ हो जाएँगी तो किसी सराहने वाले की मुन्तज़र होके अपने कदम बहका बैठेंगी, वो खुद को देख ना सके इसी लिए घर मे आईना नही रखा जाता था!
मगर ये जब नौ-उमरी के गुल खिलते है तो दिलकशी अपनी शनाख्त ढूँदने के सारे तौर तरीक़े आज़माती है!, १ पैसे की सुर्खी मिला करती थी, वही  सुर्खी लगा के मटके मे मुँह देखना, और अपनी परछाई से इश्क़ कर बैठना....!

फिर शुरू होता है दुल्हन बनने का इंतज़ार...बस एक तारीफ ओर मुहब्बत करने वाला दरकार होता है जिसके लिए लड़कियाँ  सेर भर उबटन बदन पर मलने को गर्मियों मे भी तैयार रहती थीं! फिर सुर्ख जोड़ा और नाक मे नथिया...और बस हो गया ख्वाब पूरा....पहले मेहन्दी ये कोहनियों तक डिज़ाइन वाली नही लगाई जाती थी , बस मेहन्दी की हरी पत्ती को सिल और बट्‍टे पर पीस कर एक गोला बना कर मुठ्ठी बाँध दी जाती थी! लड़कियाँ बंचपन से ही मेहन्दी से शर्त लगा बैठती हैं...तुम्हे लाल होना है मेरी हथेली पर..क्योंकि मेरा खाविंद मुझे बेहद
 चाहेगा! एक दुल्हन के शर्माए वजूद से जब उबटन,  मेहन्दी ,इत्र ओर मोगरे की मिली जुली खुश्बू आती तो पास बैठी , ज़बरदस्ती को आँसू बहाती सखियों , का ईमान भी डगमगा जाता था!

एक और खवाब भी था..डोली/ पालकी मे बैठने और खुद को क़ीमती समझने का.... मगर ग़रीब घरो मे डोली नही  रिक्शा मँगवाया जाता था...जिस पर चादर बाँध देते थे ताक़ि दुल्हन का  उजला  रूप दूल्हा से पहले कोई ना देखे. रिक्शा में बैठने से पहले और बैठने के बाद भी ,कितनी बार दुल्हन रो कर बेहोश होती थी! बिदाई के आँसू होते थे , वो समझती थी घर से बिदाई के..मगर असल में वो उसके खुद से जुदा होने के आँसू होते थे , अल्हाड़पन से रुखसती के, मासूमियत, बेफिक्री, चाँद , हवा, बारिश से रुखसती के...!
फिर घूँघट खोल के  नथिया उठा के पानी पीना भी दुल्हन को नाज़ ओ अदा  से भर देता था..छोटी और मासूम खुशियाँ..जो बाद मे बड़ी बड़ी बातों पर बात बेबात क़ुरबान होंगी, उसके तसवउर मे नही था...!
ख्वाब तो बेहद सारे थे....मगर बस शादी तक...फिर तो हक़ीक़त होनी थी..कड़वी हक़ीक़त!
अपनी ही परछाई से इश्क़ कर बैठने वाली लड़की बड़ी सहजता और सादगी से उसी परछाई के ख़ाके में अपने शरीक़  ए सफ़र का सरापा मुँह तक भर लेती , और जब सब छलकने लगता तो कहती ,औरत का नसीब यही होता है...हाँ अब वो औरत है... एक रात में  , एक सदी, एक उम्र, एक उफक़, और एक दौर, एक शनाख्त, एक नाम और ख़ुशियों  के दाम सब बदल जाते हैं.... अब वो खुद से नही किसी और से मुहब्बत करती है...और फिर मुहब्बत ख़त्म!






Wednesday, April 29, 2020

~~रूह ओ जिस्म ~~



~~रूह ओ जिस्म ~~


जिस्मों को ठोकर लगी 
रविश ए रूहानी पर
रूह ने संभाल लिया
 जूस्तजू ए जवानी पर
मुख़्तसर ये हयात थी
रूह से रूह की बात थी
नही जवान धड़कनों की तर्ज़
इश्क़ था कोई ला-इलाज मर्ज़ 
रूह ओ इश्क़ की लफानी पर
आरज़ुओं के क्या मानी पर
मेरी आरज़ू  जो थी रिस गई
तेरे पसलियों के दरमियाँ
तेरी हथेलियाँ 
तेरे बाज़ू थे 
एक शोर मे बेक़ाबू थे
मैं उंस ए मुश्क़ मे थी मुबतिला 
मेरी ख्वाहिशों का जो था काफिला 
एक नूर मे थी पिरो रही 
अश्क़ ए लहू से रो रही
तेरे तर्ज़ ए उलफत की बेयिमानी पर...
अपनी जूस्तजू की रवानी पर..
...


~~मुस्कुराएगी~~

उनका हाल भी पूछ लिया...
और अनकहा भी चख लिया..
पी कर खामोशियाँ 
दो घूँट भर क रख लिया,
की जब पराए शोर मे 
रात को चूमती ,
सहमी सी 
एक भोर मे,
कोई याद आएगा 
उलफत ए शिद्दत को 
थोड़ा सा आज़माएगा ,
वो घूँट खोल के
एक बूँद की नमी 
उम्मीद के काशकोल से 
प्यास भिगो जाएगी 
रात ठहरी है कब
ये भी तो गुज़र जाएगी ..,
फिर से सुबह हम दोनो की 
हालत ए दर्याफ़्त पर
दिल खोल क मुस्कुराएगी !

Dr Shaista Irshad

मदावा

मदावा के मायने पूछे थे उसने 
और फिर वो उर्दू की हर मौज को पुकार उठा 
यूँ जैसे हर लफ्ज़ को यूँ छू के देखा हो
जैसे कोई नाबीना अपने हाथो से 
किसी पत्थर पे तराशे मुजस्सम के नकूश पे 
रूह फूँकने की जद्दो जहद से लबरेज़ हो कर 
उसका हुस्न दोबाला कर दे...!
मायने नया पैरहन पहन लेते थे लब ओ लहजे को छू कर उसके 
की मैं उस पैरहन मे पिरोए रंगो 
की  तासीर को मसीहाई कह बैठी....,
और फिर वो सिर्फ़ कहने के हुनर से दो चार...
खुद मे इंतिहा हस्सास  "दो कान" भी रखता था ...
मैने लिखा था किसी नज़्म मे अपनी...
"दो कान की आरज़ू है मुझे..."
जब मैं बोलती वो कोरा काग़ज़ बन जाता ...
की मैं तौले जाने के ख़ौफ़ से लापरवाह...
जब अपना आप सामने रखती तो लगता 
आज मुद्दतो बाद गहरी साँस ली हो...
जैसे इसके पहले जीने जितनी साँस मयस्सर थी...
खुद को अयान कर...
खुद मे उतर के देखा है...
बेहद हसीन इत्तेफ़ाक़ था ..
खुद से मुलाक़ात का..
रूबरू होने का...
ऑर फिर बेसखता ये कहने का ...
मदावा के मायने पूछे थे उसने ..!!

Dr Shaista Irshad


Monday, April 27, 2020



~~दरीचा~~

तुम उस तवील गुफ्तगू के सहरा में 
उस दरीचे की तरह हो
जिससे बिन मौसम बरसात हो जाने  पर 
मिटटी के  भीगे बदन की खुशबु  आए ,
वह दरीचा जो सांस भर उम्मीद 
और जुमले भर लफ्ज़  देता है,
वह जुमला जो 
कानो का मुन्तज़िर 
अपने होने का अहसास यूँ पाता है
जैसे पसीना शिद्दत ए  गर्मी पी कर 
हर रोए से फूट कर  निकले ,
पेशानी पर जमा उस पारदर्शी बूँद सा
जिसमें झाँक कर देखा जा सकता है की 
कश्मकश की शिद्दत कितनी गहरी उतरी है ,
की ख्वाइश इस कैफियत का वज़न 
पलकों पर  उठा लेना चाहती है ,  हाँ
हाँ उस दरीचे से नज़रआती कैफियत का ।
मैंने अब तक नाम नहीं दिया है  दरीचे को , 
न ही किसी जज़्बे की गुलामी में तक़सीम किये  है 
उससे जुड़े जज़्बात को,
हाँ अभी जज़्बात अनछुए से है 
जैसे दरीचे के इस पार से उस  पार तक 
एक पाक फासला 
इसी फासले की नज़र वह अनकहा मरासिम 
हौले हौले सांस लेता है 
क्योंकि मैंने सुना है उस दरीचे को धड़कते हुए !

डॉ शाइस्ता इरशाद 


Thursday, April 23, 2020

दस्तूर ए ज़िंदान में
बा-दस्तूर परवाज़ है ।
बिला वजह बिला शुबह
पता है तेरे पांव का
है मरासिम शहर से गांव का
वैसे ही जैसे
विंडशील्ड पर गिरती बारिश
और
पीपल में भीगी छांव का ।
और
रिस रहें हैं अज़ल से दोनों आगोश ए ज़मीं में
ये छांव क्या वह पांव क्या ।
Zindaan- जेल, कैद
मरासिम- रिश्ता
अज़ल- eternity

Wednesday, January 20, 2016



ख़्वाब ए ज़मीं से हामिला बर्फ की क़तार है
हर ज़र्रे में जमी हुई, सोई एक बहार है
सुर्खी, सब्ज़ा तार तार यह दरख़्त ओर दयार का
दरख़्त की वो डालियां, कलियाँ ज़ार ज़ार हैं
बर्ग ए गुल कुचल गए , बर्फ में निगल गए
खुश्बुएं यतीम हैं, बिखरने पे ना इख़्तियार है
सूरज के अबरुओं पे कमसिनी शुआओं की
शाम के घूँघट पे फिर, बुझता हुआ शरार हैं
फिर ज़मीन की तिश्नगी पी गई यह सर्दियाँ
सर्दियाँ के जिगर में, अब बर्फ तार तार है
Haamla: pregnant
Barg e gul: flowers petals
Surkh: red
Sabz: green
Dayaar: world
Sharar: chingaari
Abruoan: eyebrows
Tishnagi: pyaas
Zaar: extreme pain
Shuaein: sunrays
Dr Shaista

तेरी आँखों के गुलाबी डोरे
पिरो देते हैं मेरी हर करवट में
तेरी अँगड़ाई के मौसम
मेरे वजूद के गोशों में
तेरी सांसो की ख़ुशबू लिए
बहार उतरती है
वहीं काँधे से लिपट के सोए
तेरी ज़ुल्फ़ों के ख़्वाब
पसीने से उभर उठते हैं
पेशानी पर बिखरी
तेरी लौंग की खनकती
शरारत की रानांईयां है
मेरी उँगलियों में कसे हुए
वादे हैं तेरे साथ के
मेरे पाँव से उलझी परछाइयाँ
तेरे लौट आने की
कि देंख मैं तुझे बिन
तेरी ही तस्वीर हूँ


जब तेरे ख़ुद से बिछड़ने की ख़बर आती है
मुझमे हर सू, तू ही तू नज़र आती है

तेरे सहरा ए दिल में गुल खिलाना चाहता हूं
अपनी सासों पर तेरी सासें जिलाना चाहता हूं
तुझ पर क़ुर्बान दूँ, मैं वार दूँ ये ज़िन्दगी अपनी
तेरे लब को आब ए इश्क़ पिलाना चाहता हूं

With throbbing heart, heavy with unease
Forgetting myself, in a statue I freeze
Cursing and wailing for this incurable disease
I am about to end up my life O Jeez! when,
An envelope arrives unannounced from overseas.
Shaista
तेरी बाहों को तरसती हैं मेरे वजूद की तन्हाइयां
तू पास आ कि तुझको खुद में सुलाने वाला हूँ
Shaista

तेरी क़ुरबत से हैं हामिला मेरे तसव्वुर के लम्हात
इन लम्हात को मैं मर कर भी जिलाने वाला हूँ
Haamila: pregnant
तेरी क़ुरबत से हैं हामिला मेरे तसव्वुर के लम्हात
इन लम्हात को मैं मर कर भी जिलाने वाला हूँ
Haamila: pregnant
दर्द लिखा था
लफ़्ज़ पढ़ा उसने
आंसू रिस गए थे
पानी कहा उसने
ज़ख़्म लहू लहू थे
लाइलाज किया उसने
रूह पर जिस्म का पैवन्द लेके
मैं मुहब्बत खो के
ख़ुद मुहब्बत हो गई हूँ।

Hatching from my old skin
I am no one new
But this song rejuvenates me
Happy birthday to you....
Shaista

ख्वाबों से हामिला एक झील में
सुर्ख़ फूलों से लदी एक नाव की
आग़ोश होना चाहती हूँ
मैं ख़ुशबू होना चाहती हूं
तुझमें खोना चाहती हूँ।

मैं झुर्रियों में उगा हुआ एक बचपन हूँ
मेरी निसबतें, मेरी हसरतें शबाब पर हैं।

The gust of breeze reddens your cheeks
The drops preen your hair
The bridal veil of moonlit night
Cascades down like spear
The drizzle of spraying mist
Drapes the fringes of your skin
Your milky lush beauty
Tests my infatuation
I wait with silent passion



सुनो मुझमें शोर बहोत है
पर तुम ख़ामोशी पढ़ लेना
वह जो होठों तक आके
आखों में डूब जाती है
वह जो लफ्ज़ों की क़ैद में उभरने
को छटपटाती है
वह जैसी अंधेरी रात की बारिशों में
छज्जे से टपकती है
वह जैसे किसी अल्हड़ सी दुल्हन की
मेहँदी में महकती है
वह जैसे उँगलियों पर मिट गए
तितलियों के रंग जैसी है
वह लहरों से तराशे हुए
संग जैसी है
वही खामोशी जो हर पल
जीने की आस में
तेरी उल्फ़त की प्यास में
मरती जाती है
सुनो।
तुम वह ख़ामोशी पढ़ लेना
कि मैं तुमसे कह नहीं सकती
मुझे कितनी मुहब्बत है
मुझे तुमसे मुहब्बत है

Sang: stone

अधजली शाम
कोहरे में जलती रात
चाँदनी का चखा हुआ
आधा अधूरा चाँद
ये सब गवाह हैं
कि बिन तेरे
मुझमें मुकम्मल कुछ नहीं.



~~~मेरे होने से ज़्यादा ~~~
सामने धुन्ध बिखरी पड़ी थी
क़दम क़दम पर क़दमों को चूम लेती
जैसे भीगे कोई होंठ ..
वो भीगापन सूखा जितना था
जैसे अपने लिए साँस भर ज़मीन चाहता हो
अपने होने की गवाही देने के ळिए..

..पाँव की उंगलियों के पोरों से
फ़ज़ा की खुन्की पीते हुए
उस भीगेपन को तसलीम
कर
किसी के ना होने का एहसास को
ज़िंदा कर गई थी मैं
उस एहसास को
अपनी सांसो पर जिला कर
कुछ यूँ की साँस रोक के
चाँद साँसें उधर दे कर...
.
सुनो मेरे मरने जितना जी जाओ
मेरे होने की वजह कर दो
मेरे जीने का सामान कर दो..
देखो मैं
तुम्हारे क़दमो के निशान पर पाँव रख
तुम में तब्दील होना चाहती हूँ
तुम्हारे जिस्म से गुज़र कर
तुम्हारा लिबास होना चाहती हूँ
लिबास..हाँ लिबास ..एक मुद्दत गुज़र गई मगर
मेरे जिस्म ओ लिबास से तेरी खुश्बू नही गई
होंठ कुछ भी कहें
मैं ज़हन को अपने
तेरे नाम कe विर्द में मुबतिला देखा है
यह नाम तेरा लफ़ज़ो की ज़िंदान से निकल कर
मेरी सोचो के उफक़ के परे
हर नाम में शामिल है
ओर उससे परे मेरा लहज़ा भी तुमसा है..
तुमसे है...
तुम देख सकते तो देखते मुझे
मेरे होने से ज़्यादा मुझमे
तुम्हारा ना होना साँस लेता है...
vird: repeat
zindaan: prison
shaista
लरज़ते लब की तहरीरें कभी इनकार नहीं होतीं
झुलसते अब्र की बूँदें भी कभी अंगार नहीं होती
तेरी दीद से हैं हामिला मेरी आँखों के सभी मन्ज़र
तेरी उल्फ़त न होती तो जि़ंदगी दुश्वार नहीं होती

तेरे नक्श ए पा
मंजि़ल मेरी
ये उठते क़दम
धड़कन मेरी
तेरी करवटें
तेरी दिलकशी
तेरी नीम कश
आखों में यूँ
मौसिकियां
बारिश की हैं
घुल गई ख्वाबों में जो
वह सुर्खियाँ
आरिज की हैं
तेरी मुस्कुराहट
हासिल ए ज़ीस्त
तेरी ज़ीस्त से
जिंदगी मेरी...
Shaista

आसमां के दामन से चंद बादल फ़िसल गए
बादलों की रुसवाई पर हम गिर के संभल गए
संभलना भी क्या ख़ूब था गिरने की कगार पर
एक मुद्दत से सोए आँसू यकायक उबल गए

The edges of your body
Fumed of fragrant scars
Agonies drip
in my palms,
I applied myself
Iike poultice
Soaking injuries,
Anxiety n pain
Draping my skin
Licking all wounds
Pecking beads of sweat
Oozing in vain
Aroma of me
Cascades on your face
With each reverberating moment
Pulse slips and race
Your crevices assuaged
Mine burst open
Tears gush out
Gulping space
Your are in sound sleep
and me in pain deep....
Shaista

And the echoes of ego
Drenched with love
Whispered thy name,
Nibbling the paraphernalia
of mantilla
Licking nervousness
I blushed in anticipation
Of my first caress.


चरागों के होठों पर
जल गई
पिघल गई
रात तमाम...
मद्धम सी आँच में
सुलगती रही
लौ देती तेरी आँखें
तेरी बातें...
कुछ अंधेरे जमा हैं
तेरी आँखों के दरीचों से दूर
चरागों के तले..
उन अंधेरों काे जला रही हूँ
अपने अधूरे ख़्वाब सुलगा रही हूँ
की लौ देती रहें
तेरी आँखें
तेरी बातें....


है ख़बर तुझे, क्या आलम मेरी, तन्हाइयों का है
तेरे ही वजूद में सफ़र किया बारहा तलाशा किया तुझे
Baraha: aksar
तितलियों के शहर में
रंगीनियाँ बिखरी पड़ीं
हाथ ख़ाली,और दरमियाँ
अनगिनत सरहदें खड़ी
पैरहन से बदल गए
चेहरे शनासाई के यूँ
रौशनी है हर तरफ़
अंधेरे हैं बीनाई में क्यों
ग़ुज़र गया है कारवाँ
कोई नहीं है हमनवा
ग़र्द ओ ग़ुबार से अटे हुए
मेरी उँगलियों पर टिक गए
तितलियों के परों के रंग
टिक गए फिर मिट गए....



कसक तेरी सिसकियों की तड़पती हैं जिस्म ओ रूह में
तेरी सिसकियों के होठों पर, मेरे होठ गुदाज़ रहने दे



baat se le ke tere sath tak
tere sath se har ehsaas tak..
Qatra qatra pighal kar mere wajood me simat ti
woh muhabbat thi..woh muhabbat hai


वजूद मेरा शाम की रानांई का कि़स्सा नहीं
हो ख़्वाब जिससे मुकम्मल तेरा मेरी ज़ात वह हिस्सा नहीं

मेरी वजूद की सरहद पर
तेरी छुअन के पहरेदार लिए
गुज़रती हूँ
दरमियाँ उन बंदिशों के जो
मुझे "मैं" नही होने देते...
हद और सरहद में अपनी ही ख्वाइशों की
बँधी और बटी हुई सी मैं...
मैं खुद में अधूरी ,
मैं खुद से ही मुकम्मल
खुद से तुझ तक पहुँचने की
कितनी सरहदें पार करती हूँ
तेरी मुहब्बत की
तेरी ज़रूरत की....
तेरी ही हयात की महवर
मेरी ज़ात है....
mahvar: axis
shaista

शहर के कलेजे से
गांव की निस्बत
मैं नोच लाया हूँ
बूढ़े गांव
में
बूढ़ा बचपन
जवान हो चला है
सफ़ेद पगडंडियों पर
काले घाव
मैं खरोंच लाया हूँ
खपरैल से रिसती धूप
की छाँव में
कुम्हलाती झुर्रियों
में,
फ़टते पाँव में,
उबलती जिंदगी जीने की
सोच लाया हूँ
मैं गाँव लौट आया हूँ
मैं गाँव लौट आया हूँ।
Nisbat: rishta
Shaista

ख़्वाब में भी इन आँखों को बेतक़ल्लुफ़ी की इजाज़त नहीं
की हसीन ख्वाबों की ताबीर अक्सर ख़ौफ़ज़दा करती है....

दे पनाह इन बाज़ुओं में क्या करूगीं क़ायनात
तुझमें उतर के उभरने को एक ज़माना चाहिए...

तेरी सांसो के घुँघरू
बज उठते हैं
कानों में
मौसम के बरसने पर
ख्वाइश के तरसने पर
आह तेरे लरज़ने पर...
मैं आँखें मूँद लेता हूँ
कलियाँ गूँध देता हूँ
ज़ुल्फ़ों में तेरी जाना
मेरे सीने से जो लिपटी हैं
जैसे लौ से चिंगारी
जैसे बदली हो मतवारी
बरसती है जो सिर्फ मुझपे
वह आँखें हैं कजरारी
घूँट घूँट पीता हूँ
रिस्ते हर ज़ख़्म सीता हूँ
तेरी हँसी की मय से मैं
सारे अब्र पीता हूँ
यही वह वक्त होता है
जिनमें टूट के अकसर
मैं जीता था, मैं जीता हूँ
रिस्ते हर ज़ख़्म सीता हूँ।


**कि तेरे मेरे दरमियान **
कि तेरे मेरे दरमियान
ये जो पुकार का एक सिलसिला है
कि जब जब तेरी निगाह उठे
मेरे वजूद का गोशा गोशा
लफ़्ज़ बन के तड़प उठता है
तेरी ख़मोशी में आवाज़ बन के
जी उठने के लिये....
बेतरतीब होती दड़कनें
बज़िद हो रगों में टूटती हैं
तेरे सीने में सासं बन के
धड़कने के लिये...
कितने बोसे हैं दर्ज
तेरे नाज़ुक क़दमों की रहनुमाई को
तेरे हमराह
परछाईं बन के चलने के लिये....
Bosey: kiss
Rahnumai: guidance
Bazid: obstinate
Gosha: corner

  कोई ख़ला जब माहौल में शोर के बीच बनी दरारों में बैठने लगती है , तो यूं लगता है, बेचैनी को शायद लम्हाती क़रार आने लगा है , शायद होंठ जब चुप...