Thursday, March 12, 2015



#तेरी मेरी उल्फ़त #

फ़ज़ा की महकी आग़ोॆश में जैसे जश्न ए बहारा है
पतझड़ की ओट से कलियों ने रगों को पुकारा है

नारंगियां शम्स ए शुआंओं के पोरों से चुनी हैं  मैने
चादंनी चादं के रौशन चश्म के कोरों से चुनी हैं मैने

सब्ज़ रगं छिटक उठता है उफ़क की पेशानी से
सुर्ख़ियाँ छन के उतरती हैं मेहँदी की ज़बानी से

रगं ए हया समेट के  दुल्हन के कामिनी आँचल से
ज़र्दी चुन ली है सरसों की मतवाली पायल से

तेरे हुस्न  के हर ख़म को यूँ संवारा  करे हैं  हम
ख़ुदाई रगों को लुटा के तुझपे ग़ुज़ारा करे हैं हम

मेरे इश्क़ का हर रगं क़ौस ए कज़ह की तर्जुमानी है
तेरे जिल्द से रूह तक उतरे यह जज़्बा ए रूहानी है

तेरी मेरी पहली  उलफ़त की देख यह कैसी होली है...
तेरे होठों पर मेरी सांसों से उभरी कोई रंगोली है....

क़ौस ए कज़ह: rainbow
तर्जुमानी: translation
उफ़क: horizon
चश्म के कोरों: corners of eyes
शम्स: sun
शुआंओं: sunrays

Shaista


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तुम्हारी तस्वीर 


तुम्हारे भीगे बालो से
पानी की बूंदे फिसल के
तुम्हारे काँधे पर गिर रही थी...
उन बूँदो के साथ
जाने कितने लम्हे टूट कर बिखरे थे
मेरे ज़हन से....
यहीं तुम्हारे काँधे पर
जी चाहा हाथ बढ़ा कर
एक लम्हा बंद कर लूँ
अपनी हथेली मे....
तुम्हे छू के गुज़रे
उस लम्हे को छू लूँ
फिर से जी लूँ...
उस बूँद को तकिये मे
जज़्ब कर लूँ...
तुम्हारी खुश्बू से भीगा लूँ उस रात को
जो अक्सर बे-नींद बे-ख्वाब
मुझे सिरहाने सिसकती मिल जाती है....
पानी के नन्हे क़तरे तुम्हारी तस्वीर
से झाँकते तुम्हारे काँधे से
मुझे आज भी सैराब करते हैं...
हां तिश्नगि बढ़ा देते हैं....

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तेरे तकल्लुफ़ से, हिचकने से यूँ लुत्फ़ अन्दोज़ होते हैं
जैसे मुहब्बत का पहला लम्स हो और दिल मचल मचल जाए..
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तेरी अगंड़ाईय़ों में पिरो दूँ नीन्दें अपनी
धड़कनें डुबो दूँ तेरे सांसों में
बेख़्वाब मेरी आँखें सो जानें दे
इन ज़ुल्फों से टपकती बरसातें में.....
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जो तड़प उठे दिल तेरा आवाम के दुख दॆद पर
मुझे लगता है तभी इनसान हो और तभी ज़िंदा हो तुम
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आ तुझे अपनी सांसों की खुशबू का पैरहन पहना दूँ
मेरी हर धड़कन तेरा आँचल बन छुपा लेगी खुद में तुझको....

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तुझे रूबरू देख कशमकश में हूँ जान मेरी
एहतराम में धड़कनें दिल की ठहर ना जाएं कहीं... 

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खुश्बू से तुम्हारे शाने पर
अपनी याद लिख आई हूँ
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जो पा कर तुमको मुकम्मल हो
मुझको वह अधूरापन दे दो....
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लफ्ज़ खामोश रहे, जुस्तजू में आवाज़ की
रिस गईं खा़मोशियॉं होठों की दरारों से
तेरे बदन की ओट मिले तो मिले पनाह मुझको
कि घर नहीं बना करते दर और दीवारों से...
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बारहा चिलमन ने तेरे, मेरी आँखो को हया का पैरहन बख्शा है
आ कि आज तुझे बारिशों में पिरो कर अपना तसव्वुर पहना दूँ....
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अपनी निगाहों से खामोशी के दो घूँट पिला दे साक़ी
मेरी ज़बान पर तेरे लहजे की कड़वाहट अभी बाक़ी है....
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वो मुनतजि़र थी कि जवाब हमारा आए
उसकी ख़्वाइश और हम सरापा पयाम हो गए....



~~इनकार~~
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अपने एक इनकार से तेरी
लौ देती आँखो को
यूँ मध्धम पड़ते देखा था
जैसे दूद-ए-शमा-ए-कुश्ता
लड़खड़ाया हो लौ के बुझने से
जैसे फ़ना हो जाए शबनम
पर्ताव-ए-खूर के छू लेने से
जैसे छीन ले खिज़ा
बर्ग-ए-गुल की रानाई को
तिलिस्म -ए-बहार से ...
अपने एक इनकार से तेरी
लौ देती आँखो को
यूँ मध्धम पड़ते देखा था...
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`कहने को नमक दोनो मे है, तेरे चेहरे मे भी मेरे आँसू मे भी...
तेरी नमकीन रंगत शहद -शहद , मेरे आँसू खारे - खारे हैं...
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रात के सीने मे 
चाँद की धड़कने पिन्हा' हैं
हर साँस पर 
चाँदनी के शरारे
रेत की मानिंद 
आसमान के पहलू मे 
बिखर बिखर जाते हैं
कुछ घूँट 
दरिया की लहरो के
होंठो पर
मोतियों से चुभ जाते हैं
ओर कुछ मेरी आँखो मे
तुम्हारी याद के
आँसू बन कर...
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आँसुओ के हमराह कुछ ख्वाब मेरे रिस्ते गए
खुशियों की उम्मीद मे दर्द भी पिसते गए
हसरतो की छाँव निचोड़ दी दर पे तेरे सर-बसर
और दुआएं अपनी हम सजदे में यूँ घिसते गए....
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अपनी आहों से तेरे ज़ख़्मो को सी रही हूँ मैं
अपनी सांसो से तेरी खुश्बू को पी रही हूँ मैं
रिस जाती है जो धड़कन तेरे एक आह भरने से
उसी धड़कन के नक्श-ए-पा पर ज़िंदगी जी रही हू मैं...
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सूरज की अब-तार सुलगती शुआएं 
जी उठती हैं तेरे गालों के लम्स से
जैसे दहक उठे चाँद -ए -उरूसी
छू लेने से शोलों से शम्स के....
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तू बेख़बर नींद मे बारहा कर, करवट बदल लेता है...
मेरा दिल तड़प्ता है, आँखो मे कोई ख्वाब मचल लेता है ....
तेरी करवट के दोश पे तराश लेती हूँ माज़ी की हसीं यादों को
मेरे अंदर इश्क़ रोता है... अपने होंठ कुचल लेता है... 
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आँसुओं की सूरत
टपकते ख्वाब थे 
या तेरी आँखो से गिरते अँगारे...
तुम ख्वाब देखने की बात करते हो...
मेरा दामन तार तार है...
बादलो क साथ पानियों से 
मेरी आँखे झुलस गई ...
मेरा दामन सुलग उठा....
अबके बारिश मे वो आग थी...
ख्वाबो क साथ साथ ..
दिल भी जल उठा.... 
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ख्वाइशों के सीने में ख्वाबों का ईधन भरते रहे...
ख्वाइशें जीती जाती हैं और हम मरते जाते हैं....
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एक रिश्ता

बाज़ाहिर तो यह ज़ाहिर है
मेरा तलबगार है तू
मगर तू कब यह समझेगा
मेरे दिल की पुकार है तू
निगाहों में सैलाब सा
इश्क़ का उनवान ठहरा है
बेनाम सा यह रिश्ता
तेरे मेरे नाम सा गहरा है
इस रिश्ते की जिल्द पर
तेरा लम्स चाहा है
हाय मैने क़मर की आगोश में
दहकता शम्स चाहा है
नक्श हैं तेरी उंगलियों के निशान
मेरे बाज़ुओं के पोर पोर में
डूब गई है हर आवाज़
तेरी लरज़ती सांसो के शोर में
क़यामत गुज़र रही मुझपे
मैं जानू या खुदा जाने
या तुझको मुझको छू के गुज़रता
लम्हा वो जुदा जाने
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सर्दी गरमी बारिश को महसूस ना कर पाऊँ
ऐ काश मुझे फिर वह ,पहली सी मुहब्बत हो जाए.....
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Wednesday, March 11, 2015

I Am No More the “Other”
I don’t merely survive
I rejuvenate and revive,
From the dregs of impasse
The apogee I surpass,
The umbilical cord dives
Impregnating oceans of lives,
I blush and bloom
Still the future I loom,
From the verdure of my femininity
Elevating nadir of anonymity,
I’m not my body
I’m not my sex,
The corporeal incarceration
I reject,
Deconstructing gender roles
I transverse,
When time heralds
I reverse,
I’m the mother
I’m the father,
I’m the eternity
I’m no more the “other”.





मुट्ठी भर धूप
चुभ रही थी
मेरे वजूद से बिछड़ती
शाम के पाँव में,
तेरे पहलू में
जाना था
क्या होता है
धूप के सीने में
शाम का जलना,
देख जो अब तू नहीं
तो हर पहर चुभन
हर तपिश छाँव है...
मैं भुला बैठी हूँ
अपनी जिल्द पर
प्यास हर मौसम की....

तुम्हारी एड़ियों से लिपटी
परछाईं को
इन निगाहों की धूप का
बोसा पहना कर
बारहा तुझको देखा किया मैने,
तेरी परछाईं में पिन्हां हैं
तेरे नाम पर धड़कती
मेरी धड़कनों का सुकूत,
मेरी निगाहों को
तेरे लम्स के पार
ग़ुज़रने दे
तेरी परछाईं जज़्ब कर
तुझको पाना
चाहता हूँ
मैं एक बार फ़िर
मुसकुराना चाहता हूँ...
लम्स: touch, chhuan
पिन्हां: embedded, doobi hui
सुकूत: silence, khamoshi 


अगर वो देख लेता ...

~~अगर वो देख लेता ...~~ वो दम बखुद मोबाइल और  वाइ फ़ाई के सिग्नल्स जिस शिद्दत से देखता है, काश उसने यूँ ठहर कर मेरे खामोश लबों की जानिब...