Sunday, March 2, 2014
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कोई ख़ला जब माहौल में शोर के बीच बनी दरारों में बैठने लगती है , तो यूं लगता है, बेचैनी को शायद लम्हाती क़रार आने लगा है , शायद होंठ जब चुप...
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~~क्वारन्टाइन में एक माँ~~ कौन सी नज़र, नज़र ए आख़िर थी ये उस चौखट के सीने मे धसी आखरी ख्वाइश सी बेताब नज़र की गवाही मे ...
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मुझे जुनून की हद के पार ले जाने को तेरी मुहब्बत का आगाज़ ही काफ़ी है. जो थपक दे मेरे रोते बिलखते दर्द को ऐसे सुकून को तेरा सीना...
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बेनाम मरासिम वो मसनूई एक आवाज़ है जो तमाम तहों में सिमट के भी करे है मदावा मेरे हाल का जैसे छुपा हुआ कोई चIरागर मैं आँसुओं म...

nice lines mam :)
ReplyDeletethanks kartikey :)
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