Saturday, May 3, 2014





*अधूरापन*
कच्ची पक्की नींद की खुमारी में भी 
तू भूलता नहीं...
हर करवट पे तकीए की तरह तुझे 
बदन के इस ओट से 

उस ओट तक सीने से लगा के रखती हूँ..
सोते मे तुम बड़े प्यारे लगते थे....
सिरहाने तुम्हारी साँसों की महक 
भी आबाद रहा करती थी...
बेइख्त्यार तकिये पे उस खुश्बू को जगाया मैनें...
तेरी छुअन को भी खुद पे सजाया मैने
तुम्हारी सुबह मेरे भीगे बालों से बेदार होती थी
अब भीगे बालों से टपकता बूँद बूँद पानी 
मेरे आँसुओं को धो रहा है....
अब लौट आओ
रोम रोम मुंतज़ीर है...



~औरत~
~कभी जो गौर से अपनी शक़्ल देखती हूँ तो अपनी अम्मा का चेहरा नज़र आता है... वक़्त बीत जाता है..मगर औरत की कहानी...बदलने की नहीं.. बचपन से अम्मा को रोते बिलखते देखा... वो चुप रहती थी..हर घलत सही के जवाब में खामोश...अब्बा जो भी कहते सब सही ..फिर भी उनका हाथ उठ जाता....और अब...मैं.. मैं नए ज़माने की हूँ ..सोचती थी कभी ना सहूंगी अम्मा के जैसे ... आख़िर..आख़िर अपने पैरों पर खड़ी हूँ..मगर क्या बदला है...अम्मा चुप रहके पिटती थी ..ओर मैं ज़बान दराज़ी कर के...! अपना चेहरा जो आईने में देखती हूँ तो लगता है यह मेरा नहीं अम्मा का चेहरा है आँसुओं से तर- बतर.. ज़ोर ज़ोर से रगड़ के अम्मा का चेहरा छुड़ाना चाहती हूँ..उनकी क़िस्मत मिटाना चाहती हूँ अपने चेहरे से..मगर, औरत का नसीब...क्यों कर बदलेगा ..मुहब्बत को तरसती क़ब्र तक पहुँच जाती है...औरत...~

तेरी परछाई से उलझ पड़ी हूँ
तेरी हमनवाई का हक़ मेरा था ...मेरा है

एक वक़्त ऐसा था लड़कियों को आईना देखने की इजाज़त नही थी .. लेकिन लड़कियाँ खुद को ना निहारे
तो अल्हड़पन को कैसे पार करती... १ पैसे की सुर्खी खरीद लाती ओर चुपके से होंठों पर रगड़ के
मटके मे मुँह डाल देती... अंधेरे मटके के पानी में ढुंधलया सा अक्स जाने कैसी खुशी देता था...अपने कामिनी कमसिन से रंग में लबरेज़ खुद को हसीन मान के बेपनाह ख्वाब सजा लेती... खूबसूरत लगने का शौक़... सराहे जाने की आरज़ू जाने कितने सदियों से चली आ रही है...

Friday, May 2, 2014




पलकों पे रख के होंठ
तेरी नींदों मे घुल गई हूँ
हक़ीक़त के उस पार
ख्वाबों मे रूल गई हूँ
रिस रही हूँ तेरी जिल्द से
तेरे बदन के गोशे गोशे में
करके वज़ू आँसुओं से
तेरे इश्क़ मे धुल गई हूँ

Sunday, April 20, 2014





ना वो कशिश ..ना वो तड़प ...ना ही वो बेक़ारारी है
जागी सी तेरी बेरूख़ी, और सोई वो पहली सी खुमारी है 



गुज़रा है वक़्त वो भी तेरे हबीब थे हम
फ़ासले थे दरमियाँ फिर भी क़रीब थे हम



<बारिश का एहसास>

बादल चुग रहे थे
बारिश की बूँदो से
तिश्नगि ज़मीन की
भीगी हुई नमी से
ज़र्रे ज़र्रे का जिगर
चाक किया...
धुल कर वज़ू से
पाक़ किया...
खुश्बुओ को आसरा
देकर
खुली फ़ज़ा में
बसेरा देकर
ज़मीन की कोख
से आज़ाद किया
रूमानी शनसाई दी
हवा को हमनवाई दी...



एक उम्र तक प्यासा भटकता रहा हूँ मैं
एक ज़रा सी मुरव्वत भी तेरी आब-ए-हयात लगती है... 

तेरी जुदाई में भी सनम, वो लज़्ज़त है ..
की चाँद भी ज़ायकेदार मालूम होता है...


बारिश की मखमली फुहार सी
तेरी यादें बरस रही हैं...
हर बूँद में तेरा अक्स तलाशती 
मेरी आँखें तरस रही हैं...

सोंधी खुश्बू सी याद तेरी
पी रही हूँ बारिश से....


होंठो पे उभरे थे लफ्ज़ की चुन लिया तूने..
वास्ते तेरे धड़का था दिल की सुन लिया तूने
जिस्म मेरा है मगर हर एहसास तेरा है
पलके थी बोझल मेरी, ख्वाब बुन लिया तूने...

वो हाथ जिन्हे तूने कभी थामा ही नहीं
वो हाथ तेरे लम्स को तरसते ही रहे

हमने दिल की धड़कने उधेड़ डाली मगर...
इनमे जो तेरी याद रहा करती थी मिलती ही नही ...

दो किनारेl को मिलlने की आरज़ू में
दरिया सिमट गया अपना पानी पी गया...

तूने चूमा था जब अपनी उंगलियों से मेरी कलाई को
रोएँ रोएँ में दिल को धड़कते महसूस किया था मैने

तेरे काँपते क़दमो से उठती आहट को पढ़ रहा हूँ...
दिल मे सँवर्ती ओर उमड़ती चाहत को पढ़ रहा हूँ...
पढ़ रहा हूँ इस चेहरे की दिलकशी ऑर नकूश को...
तेरी नर्म उंगलियों मे उतरती घबराहट को पढ़ रहा हूँ...



तेरे चेहरे पर यह बला की कशिश मेरे इश्क़ के दम से है
ज़रा सोच चाँद भी कहीं चमकता है रोशनी से अपनी 

काँच पर फिसलती पानी की बूँदो सी हँसी तेरी
जी चाहता है आँखो से इन्हे पीता जाऊँ मैं....



Thursday, April 10, 2014



तेरी नसों मे गुमनाम सी बहती हूँ
तेरी धड़कन में चुपचाप सी रहती हूँ
पूछ गालों पर ठहरे उन सूखे आँसुओ से
किस तरह तेरी आखों से रोज़ ढहती हूँ



तेरी यादों की आवाज़ के सहारे
मैं खामोशियों को पढ़ने का हुनर सीख गई हूँ



अपनी आँखो के जाविए को मेरे आँखो के सिम्त मोड़ कर
तू कह दे की तुझसे बिछड़ के भी तुझमे ज़िंदा रहा हूँ मैं

अब क्या?

क़िस्मत आज़मा ली....
अब क्या?
मुहब्बत भी पा ली
अब क्या?
सरशार हूँ
गुलज़ार हूँ
नही कोई भी मशगला है अब
बेकैफ़ सिलसिला है अब
खुद से बेज़ार हूँ
हर लम्हा बेक़रार हूँ
बेज़ारी छुपा ली
अब क्या?
नए ख्वाब
नई हसरते
नहीं बदलती इंसान की फ़ितरातें
फ़ितराते सुला ली
अब क्या?
ख्वाबों की अनगिनत लडियाँ
तIबीर में ढाल लीं
अब क्या?

ऐ दो जहाँ के मालिक अपनी रहमतें मुझपे वार दे
उड़ जाए धूल रूह की ऐसा कोई गर्द-ओ-गुबार दे
मंज़िल पर पहुँच के भी जाने क्यों प्यासी रही हूँ मैं
बुझ जाए तिश्नगि रूह की वो क़रार मुझमे उतार दे


Thursday, April 3, 2014



~~ढूँढती हूँ~~ Ek Ghazal

रोज़मर्रा के कामों मे अपनी पहचान ढ़ूँढती हूँ
जो खुद से मिला मुझको वो समान ढूँढती हूँ
देखे चाँद मुझको एक ज़माना गुज़र गया है
दिख जाए गर चाँद तो अपनी "जान" ढूँढती हूँ
समझे जो मेरी चुप को तौले ना मेरे लफ्ज़ को
खामोशियों का एक ऐसा क़दरदान ढूँढती हूँ
शजर जिसके खुश्बू, रहगुज़ार में जिसके खुश्बू
खुश्बुओ से मोअत्तर एक गुलिस्ताँ ढूँढती हूँ
खामोशियों से ला दे इंक़लाब सबके दिल में
लफ़ज़ो को करदे निहत्था वो बेज़बान ढूँढती हूँ
वार दे अपना सब कुछ वाल्दैन के लिए जो
औलाद की ज़िंदगी की ऐसी दास्तान ढूँढती हूँ



#shaista








यह पलकें...यह नींद का बोझ और तेरी खुश्बू की पनाह
क़तरा क़तरा उतर रहा है सुकून मुझमे ख्वाब की तरह... 


आँसुओ की सूरत ,तेरे सीने मे जज़्ब है मेरी अनकही मुहब्बत की निशानियाँ..
एक बार लगाया था गले से तूने मेरी आँखो को रोता देखकर....




वो आतिश ,वो आँच है ऐ साहिर लहजे मे तेरे....
मेरे जज़बों पर जमी खामोशी की बर्फ बेइख्त्यार पिघलती जाती है...


Tuesday, March 18, 2014



मुझे जुनून की हद के पार ले जाने को
तेरी मुहब्बत का आगाज़ ही काफ़ी है.
जो थपक दे मेरे रोते बिलखते  दर्द को
ऐसे सुकून को तेरा सीना गुदाज़ काफ़ी है
करने को मुझे हर पल खुद से गाफिल
तेरी सांसो का मद्धम साज़ काफ़ी है
जान! मेरा ज़ब्त-ओ-गुरूर आज़माने को
तेरा नींद में डूबा हुआ अंदाज़ काफ़ी है
कौन काफ़िर चाहता है एक उम्र का जीना
तेरे साथ का एक लम्हा उम्र दराज़ काफ़ी है
किसी और की आँखों में सुर्कुरू क्यों होना
वास्ते मेरे तेरी एक निगाह हमनवाज़ काफ़ी है

  कोई ख़ला जब माहौल में शोर के बीच बनी दरारों में बैठने लगती है , तो यूं लगता है, बेचैनी को शायद लम्हाती क़रार आने लगा है , शायद होंठ जब चुप...